बस्ती। ईश्वर से सम्बंध जोड़कर हमेंशा के लिए उन्हें अपना सकता है। श्रीमद्भागवत कथा की सार्थकता तभी सिद्ध होती है जब इसे हम अपने जीवन व व्यवहार में उतारे। अन्यथा यह कथा केवल मनोरंजन मात्र बनकर रह जायेगी। कथा से मन का शुद्वि करण होता है। इससे संशय दूर होता है और मन को शान्ती भी मिलती है। जिससे जीवन सुगम हो जाता है। यह बाते अयोध्या धाम से पधारे राष्ट्रीय कथा वाचक मुक्तामणि शास्त्री ने दुर्गा नगर कटरा में चल रही नौ दिवसीय भागवत कथा में व्यक्त किए। महात्मा जी ने कहा कि अभियान व सुखी रहने की इच्छा प्रक्रिया कहलाती है जिसे न तो कर्तव्य का अभिमान है और न ही सुखी रहने की इच्छा। दूसरों को सुखी रखने की इच्छा को लीला कहते हैं। श्री कृष्ण के बाल लीलाओ का वर्णन करते हुए उपस्थित श्रोताओं को वात्सल्य रस से शराबो और कर दिया। उन्होंने बताया कि भगवान हमेशा लोगों का कल्याण करते हैं। पूतना नें श्री कृष्ण को स्तनपान करा विष पिलाया, और भगवान ने उसे अपनी मां का स्थान दे। इसी प्रकार कार्तिक माह में बृजवासी भगवान इंद्र को प्रसन्न करने के लिए पूजन कार्यक्रम की तैयारी करते हैं परंतु भगवान कृष्ण उनको इंद्र की पूजा करने से मना कर देते हैं, और गोवर्धन की पूजा करने के लिए कहते हैं। यह सुनकर भगवान इंद्र नाराज हो जाते हैं और गोकुल को बहाने के लिए भारी वर्षा करते हैं। भारी वर्षा को देखकर भगवान कृष्ण कनिष्ठ अंगुली पर गोवर्धन पर्वत को उठाकर सभी लोगों को उसके नीचे छुपा लेते है।कार्यक्रम आयोजक प्रमोद पांडेय, चेयरमैन प्रतिनिधि अंकुर वर्मा, राजन पांडेय, हरैया विधायक प्रतिनिधि सरोज मिश्रा, एडवोकेट फूलचंद्र पांडेय, शैलेंद्र दुबे, विनोद शुक्ला, सभासद परमेश्वर शुक्ला पप्पू, विपुल पांडेय, संतोष गुप्ता, सूर्य प्रकाश शुक्ला, केडी पांडेय, अनिल श्रीवास्तव सहित तमाम भक्त मौजूद रहे।
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