भारत की विदेश नीति का अमृतकाल!


हरिशंकर व्यास
भारत की विदेश नीति शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के सिद्धांत पर आधारित रही है। लेकिन आज स्थिति है कि दक्षिण एशिया में, जहां आबादी और भौगोलिक कारणों से भारत को दादा होना चाहिए था वहां भी कोई देश भारत की बात नहीं सुन रहा है। न किसी देश में भारत के लिए प्यार बचा है और न किसी के मन में भारत की चिंता या भय है। नेपाल इसकी मिसाल है। बड़ी मुश्किल से नेपाल ने भारत के दो सौ और पांच सौ रुपए की नोट रखने और स्वीकार करने की इजाजत दी है। उसने एक दशक से ज्यादा समय से भारत की एक सौ रुपए से ऊपर के मूल्य की मुद्राओं को स्वीकार करना बंद कर दिया था। अब भी एक सीमा लगाई गई कि कोई भी भारतीय या नेपाली नागरिक दो सौ या पांच सौ रुपए के नोट 25 हजार रुपए से ज्यादा नहीं रख सकता है।
नेपाल एक समय दुनिया का एकमात्र हिंदू राष्ट्र माना जाता था।
भगवान शिव के द्वादश ज्योर्लिंगों में से एक पशुपतिनाथ का मंदिर काठमांडू में है। लोग तीर्थाटन करने से लेकर घूमने और व्यापार करने के लिए नेपाल जाते थे। बिहार व पूर्वी उत्तर प्रदेश के बड़े हिस्से के लोगों की रिश्तेदारियां नेपाल में हैं। दोनों तरफ शादियां होती रही हैं। लेकिन धीरे धीरे नेपाल कूटनीतिक, राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से भारत से दूर हो गया है। नेपाल के लोगों में भारत के प्रति अविश्वास है। भारत के नेताओं के बयानों और सरकार के कई फैसलों ने लोगों को नाराज किया है। नेपाल में हिंदी फिल्मों का बहिष्कार होता है। भारत की मुद्रा का तिरस्कार होता है। लोग भारत विरोधी नारे लगाते हैं। सीमा के पास खेतों में काम करने वाले लोगों पर हमले होते हैं। नेपाल कालापानी और लिपूलेख जैसे भारत के इलाकों को अपना बताता है। चीन की कूटनीति नेपाल पर हावी है और भारत उससे दूर हो गया है। नेपाल के साथ भारत के संबंध कभी भी पहले जैसे होंगे इसमें अब संशय है। चीन की मदद से पाकिस्तान के लोगों की नेपाल में कद्र है लेकिन भारत के हिंदू बेगाने हो रहे हैं।
बांग्लादेश का निर्माण भारत ने कराया था। भारत की तत्कालीन सरकार ने मुक्ति वाहिनी की लड़ाई को हर तरह से मदद दी थी। पाकिस्तान की सेना ने भारत के सामने सरेंडर किया था और भारत ने सबसे पहले एक स्वतंत्र देश के तौर पर बांग्लादेश को मान्यता दी थी। लेकिन आज बांग्लादेश में सबसे ज्यादा नफरत भारत से है और हिंदुओं से है। आए दिन हिंदुओं पर हमले हो रहे हैं। उनको देश छोड़ने या धर्म परिवर्तन के लिए बाध्य किया जा रहा है। नेपाल में चीन और पाकिस्तान का अड्डा बन रहा है। पाकिस्तान के ढाका स्थित उच्चायोग से पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के अधिकारी भारत विरोधी साजिशें कर रहे हैं। कट्टरपंथी ताकतें मजबूत हो रही हैं और सीमा पर भारत की स्थिति कमजोर होती जा रही है।
कमोबेश यही हाल हर पड़ोसी के साथ है। चीन के साथ सीमा का विवाद है और घनघोर अविश्वास है। भारत एक तरह से चीन का आर्थिक उपनिवेश बन गया है फिर भी चीन की नजर भारत के अरुणाचल प्रदेश पर है। वह बांग्लादेश, पाकिस्तान, म्यांमार और श्रीलंका के जरिए भारत को घेरे हुए है। श्रीलंका के आर्थिक संकट में भारत ने सबसे पहले मदद की लेकिन श्रीलंका का झुकाव लगातार चीन की ओर है। म्यांमार की सैनिक तानाशाही चीन के असर में है। पाकिस्तान तो ऑपरेशन सिंदूर के बाद शेर हो गया है और दक्षिण एशिया के दादा की तरह बरताव कर रहा है। बांग्लादेश, नेपाल हर जगह उसके ठिकाने बन रहे हैं। ऐसे ही मालदीव भी चीन का मोहरा बना है। लगभग हर प़डोसी के साथ भारत का सामरिक टकराव स्थाई होता है। मगर सत्ता के चश्मे से क्या दिख रहा है? भारत की विदेश नीति का अमृतकाल!

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