बाल-सुरक्षा और तकनीकी समाधानवाद :

– डॉ प्रियंका सौरभ

डिजिटल युग में बच्चों और किशोरों का जीवन केवल भौतिक संसार तक सीमित नहीं रह गया है। सामाजिक माध्यम, ऑनलाइन मंच और आभासी समुदाय आज उनके सीखने, अभिव्यक्ति, पहचान और सामाजिक संबंधों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे समय में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि इन मंचों पर बच्चों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए। हाल ही में ऑस्ट्रेलिया द्वारा सोलह वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सामाजिक माध्यमों पर पूर्ण प्रतिबंध का प्रस्ताव इसी चिंता से उत्पन्न हुआ है। परंतु इस कदम को लेकर यह आलोचना भी सामने आई है कि यह एक जटिल मनो-सामाजिक समस्या का अत्यधिक सरलीकृत, तकनीक-आधारित समाधान है, जिसे ‘तकनीकी समाधानवाद’ कहा जा रहा है।

तकनीकी समाधानवाद का अर्थ है यह मान लेना कि सामाजिक, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक समस्याओं को केवल तकनीकी नियमों, प्रतिबंधों या उपकरणों के माध्यम से हल किया जा सकता है। बच्चों के संदर्भ में यह दृष्टिकोण विशेष रूप से सीमित प्रतीत होता है, क्योंकि बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य, आत्मसम्मान, सामाजिक तुलना, ऑनलाइन उत्पीड़न, अकेलापन और व्यवहारिक परिवर्तन केवल मंच तक पहुँच रोक देने से समाप्त नहीं होते। ये समस्याएँ परिवार, विद्यालय, सहपाठी समूह, सामाजिक वातावरण और व्यापक सांस्कृतिक प्रवृत्तियों से गहराई से जुड़ी होती हैं। ऑस्ट्रेलिया का प्रस्ताव इन जटिल कारणों की बजाय सीधे निषेध पर केंद्रित दिखाई देता है।

ऑस्ट्रेलिया के प्रस्तावित कानून के अनुसार, सोलह वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सामाजिक माध्यमों का उपयोग प्रतिबंधित किया जाएगा और आयु-सत्यापन की अनिवार्य व्यवस्था लागू की जाएगी। पहली दृष्टि में यह कदम बच्चों की सुरक्षा के लिए कठोर और निर्णायक लगता है, किंतु व्यवहारिक स्तर पर इसके कई प्रश्नचिह्न हैं। आयु-सत्यापन के लिए व्यापक व्यक्तिगत जानकारी एकत्र करनी पड़ सकती है, जिससे बच्चों और उनके अभिभावकों की निजता पर खतरा उत्पन्न होता है। इसके अतिरिक्त, तकनीकी उपायों को आभासी निजी नेटवर्क, फर्जी पहचान या नए, कम नियंत्रित मंचों के माध्यम से आसानी से दरकिनार किया जा सकता है। इससे न केवल कानून की प्रभावशीलता कम होती है, बल्कि बच्चे अधिक जोखिमपूर्ण डिजिटल स्थानों की ओर भी जा सकते हैं।

पूर्ण प्रतिबंध का एक और गंभीर पक्ष यह है कि यह बच्चों को सामाजिक माध्यमों से मिलने वाले सकारात्मक अवसरों से भी वंचित कर सकता है। आज अनेक बच्चे इन्हीं मंचों के माध्यम से शैक्षिक सामग्री प्राप्त करते हैं, रचनात्मक गतिविधियों में भाग लेते हैं, सामाजिक मुद्दों पर जागरूक होते हैं और मानसिक स्वास्थ्य सहायता समूहों से जुड़ते हैं। विशेष रूप से ग्रामीण, पिछड़े या सामाजिक रूप से हाशिये पर खड़े बच्चों के लिए डिजिटल मंच कई बार अभिव्यक्ति और सहयोग का एकमात्र साधन होते हैं। ऐसे में पूर्ण प्रतिबंध सामाजिक असमानताओं को और गहरा कर सकता है। यह दृष्टिकोण यह भी संकेत देता है कि समस्या का मूल बच्चों या तकनीक में है, जबकि वास्तव में समस्या उस सामाजिक ढाँचे में है जिसमें बच्चों का डिजिटल समाजीकरण हो रहा है।

भारत ने इसी संदर्भ में एक भिन्न और अपेक्षाकृत संतुलित मार्ग अपनाया है। डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 बच्चों की सुरक्षा के लिए प्रत्यक्ष निषेध के बजाय अधिकार-आधारित और डेटा-केंद्रित दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। यह अधिनियम यह स्वीकार करता है कि बच्चों को डिजिटल संसार से अलग-थलग करना न तो संभव है और न ही वांछनीय। इसके स्थान पर, यह आवश्यक है कि डिजिटल मंचों को उत्तरदायी बनाया जाए और बच्चों के अधिकारों की रक्षा की जाए। इस कानून के अंतर्गत बच्चों के व्यक्तिगत डेटा के प्रसंस्करण के लिए सत्यापित अभिभावकीय सहमति को अनिवार्य किया गया है, जिससे परिवार की भूमिका सुदृढ़ होती है।

डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह बच्चों के व्यवहारिक निगरानी, व्यक्तित्व-आधारित वर्गीकरण और लक्षित विज्ञापनों पर स्पष्ट प्रतिबंध लगाता है। इससे बच्चों को उपभोक्ता के रूप में शोषण से बचाने का प्रयास किया गया है। साथ ही, यह अधिनियम बच्चों को डेटा तक पहुँच, उसमें सुधार, उसे हटाने और शिकायत दर्ज कराने जैसे अधिकार प्रदान करता है। यह दृष्टिकोण बच्चों को केवल संरक्षण की वस्तु न मानकर उन्हें अधिकार-संपन्न नागरिक के रूप में देखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

इसके अतिरिक्त, भारत में एक स्वतंत्र डेटा संरक्षण बोर्ड की व्यवस्था की गई है, जो नियमों के उल्लंघन पर दंड निर्धारित कर सकता है। इस प्रकार, मंचों और डेटा का प्रसंस्करण करने वाली संस्थाओं पर जवाबदेही सुनिश्चित की जाती है, बिना यह कहे कि बच्चों को डिजिटल मंचों से बाहर कर दिया जाए। यह मॉडल यह भी दर्शाता है कि कानून के साथ-साथ सामाजिक जागरूकता, डिजिटल साक्षरता, विद्यालयों में ऑनलाइन सुरक्षा शिक्षा और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार अनिवार्य है। केवल कानून बनाकर बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती, बल्कि एक समग्र सामाजिक प्रयास की आवश्यकता होती है।

ऑस्ट्रेलिया और भारत के दृष्टिकोणों की तुलना करने पर स्पष्ट होता है कि जहाँ एक ओर नियंत्रण और निषेध पर आधारित नीति है, वहीं दूसरी ओर संतुलन, सहभागिता और सशक्तिकरण पर आधारित ढाँचा। ऑस्ट्रेलिया का प्रस्ताव त्वरित समाधान का आभास देता है, किंतु दीर्घकाल में यह व्यवहारिक, संवैधानिक और सामाजिक चुनौतियों से घिर सकता है। इसके विपरीत, भारत का मॉडल धीमा और जटिल अवश्य है, परंतु यह बच्चों की स्वायत्तता, निजता और विकास के साथ बेहतर सामंजस्य स्थापित करता है।

अंततः, बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा का प्रश्न केवल यह नहीं है कि उन्हें किससे दूर रखा जाए, बल्कि यह भी है कि उन्हें किस प्रकार सशक्त बनाया जाए। डिजिटल युग में बाल-सुरक्षा का अर्थ बच्चों को तकनीक से अलग करना नहीं, बल्कि उन्हें तकनीक के साथ सुरक्षित, जागरूक और जिम्मेदार बनाना है। सरल तकनीकी समाधान जटिल मानवीय समस्याओं का स्थान नहीं ले सकते। इस संदर्भ में भारत का डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण ढाँचा यह संकेत देता है कि संतुलित नियमन, अभिभावकीय सहभागिता, मंचों की जवाबदेही और सामाजिक समर्थन के माध्यम से ही बच्चों के लिए एक सुरक्षित और समावेशी डिजिटल भविष्य का निर्माण संभव है

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