संविधान लागू होने के 76 साल बाद भी दलित की दुर्दशा

प्रयागराज। आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के तत्वाधान में विगत पहली जनवरी से यमुनापार की तहसील बारा और करछना में संविधान के सम्मान में निकाली गई गणतंत्र पदयात्रा का समापन सोमवार को गणतंत्र दिवस की 76 वर्षगांठ पर शंकरगढ़ बाजार में शांतिपूर्वक  सादगीपूर्ण ढंग से गणतंत्र पदयात्रा निकाली गई। यह गणतंत्र पदयात्रा शंकरगढ़ ब्लाक परिसर में गणतंत्र महोत्सव आयोजित कर समापन किया गया।

गणतंत्र पदयात्रा और गणतंत्र महोत्सव के संयोजक आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के सदस्य उच्च न्यायालय के अधिवक्ता आईपी रामबृज ने बताया कि संविधान लागू होने के 75 साल बीत जाने के बाद भी संविधान के उद्देश्यों समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व की भावना और सबको सामान न्याय मिलना आज भी टेढ़ी खीर हो गई है। भारत का भुक्तभोगी तपका अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति जिस दशा में था उसी दुर्दशा में ज्यों का त्यों बना़ हुआ है जो आज भी बेहद गरीब व सर्वहारा वर्ग की श्रेणी में समाज के सबसे निचले पायदान पर पड़ा हुआ है जिन्हें आज भी उत्पादन के साधन मुहैया नहीं कराए गए। एक ओर आज जहा समाज ने उन्हें अस्वीकार कर दिया है तो सरकार ने भी उनकी जिम्मेदारी लेने से कासिर हो गई है। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति सर्वहारा वर्ग होकर अथवा भूमिहीन खेतिहर मजदूर होकर आज भी गांव के काश्तकारों के यहां नाममात्र की मजदूरी पर श्रम बेचने को मजबूर हो गए हैं तथा अपनी जीविका के लिए सवर्ण काश्तकारों के ऊपर निर्भर हैं। जिसका मुख्य कारण संविधान के आर्थिक ढांचे को राजनैतिक ढांचे की तरह न बदलने के कारण पैदा हुई है जबकि संविधान लागू होने के तुरन्त बाद ही आर्थिक ढांचा तोड़कर एक व्यक्ति एक मूल्य की स्थापना करना चाहिए़ था किन्तु अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति अर्थात सर्वहारा वर्ग के हक में बुनियादी तौर पर कदम उठाने में शासक वर्ग उदासीन दिखा है जो वर्गीय पक्षपात का द्योतक है।

आसपा सदस्य आईपी रामबृज ने आगे बताया कि भारत प्रधानतः खेतिहर देश है और अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति की विशाल संख्या खेतों में काम करने को मजबूर है। ऐसे वक्त में देश का इंतजाम करने वालों का परम कर्तव्य बन जाता है कि खेती के हुनर में हाड़ तोड़ काम करके उत्पादन करने वाले भूमिहीन खेतिहर मजदूरों में भूमि बांटकर उत्पादन का साधन मुहैया कराना चाहिए़ तथा कृषि और उद्योगों का प्राइवेट संपत्ति के रहते हुए राष्ट्रीयकरण करना चाहिए़ था। गणतंत्र पदयात्रा में तहसील बारा और करछना से हजारों की संख्या में लोग उपस्थित रहे।

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