प्रयागराज। हर सर्दी में उत्तर भारत के कई शहर और कस्बे घने स्मॉग की चादर में ढक जाते हैं। आंखों में जलन, खांसी, सांस फूलना और आसमान में धुंधलापन और धुएं की परत साफ दिखाई देती है। आमतौर पर प्रदूषण को फेफड़ों की बीमारी से जोड़ा जाता है, लेकिन इसका दिल पर पड़ने वाला असर कम समझा जाता है। आम लोगों के लिए यह जानना जरूरी है कि सर्दियों का वायु प्रदूषण सिर्फ सांस लेने की नहीं, बल्कि हृदय स्वास्थ्य के लिए भी एक गंभीर खतरा है।
सर्दियों में प्रदूषण बढ़ने का बड़ा कारण यह है कि धुआं और जहरीली गैसें जमीन के पास ही फंस जाती हैं। ठंड के मौसम में टेम्परेचर इनवर्ज़न की स्थिति बनती है, जिसमें ऊपर की गर्म हवा प्रदूषित हवा को ऊपर उठकर फैलने से रोक देती है। नतीजतन वाहनों, फैक्ट्रियों, लकड़ी और कचरा जलाने, पराली जलाने और त्योहारों के दौरान पटाखों से निकला धुआं हवा में लंबे समय तक बना रहता है। कम हवा और कोहरे की वजह से प्रदूषण का स्तर कई दिनों तक ऊंचा रहता है।
मैक्स स्मार्ट सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, साकेत के कार्डिएक साइंसेज़ (कार्डियोलॉजी) विभाग के प्रिंसिपल डायरेक्टर एवं यूनिट हेड डॉ. रिपेन गुप्ता ने बताया कि इस प्रदूषित हवा में PM2.5 जैसे बेहद सूक्ष्म कण होते हैं, जो फेफड़ों के भीतर गहराई तक पहुंचकर सीधे खून में मिल सकते हैं। शरीर में पहुंचते ही ये कण ब्लड वेसल्स में सूजन और जलन बढ़ाते हैं, जिससे दिल पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है, दिल को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है और ब्लड क्लॉट्स बनने का जोखिम भी बढ़ जाता है। जिन लोगों को पहले से हृदय रोग, हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज है या जो बुज़ुर्ग हैं, उनके लिए प्रदूषित हवा हार्ट अटैक, हार्ट फेलियर के बढ़ने या दिल की धड़कन बिगड़ने जैसी गंभीर स्थितियों को ट्रिगर कर सकती है। स्मॉग के गंभीर दिनों में अस्पतालों में दिल से जुड़ी इमरजेंसी के मामले अक्सर बढ़ जाते हैं। इतना ही नहीं, जो लोग खुद को “पूरी तरह स्वस्थ” मानते हैं, वे भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं। लंबे समय तक बार-बार प्रदूषित हवा में सांस लेने से दिल और ब्लड वेसल्स को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचता है, जिससे आगे चलकर हृदय रोग का खतरा बढ़ जाता है।
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