माघ मेले में त्रिजटा संगम स्नान, ली कल्पवास से विदाई

प्रयागराज। माघ मेले में माघी पूर्णिमा के तीसरे दिन त्रिजटा संगम स्नान कर कल्पवास से विदाई ली। इस अवसर पर हजारों श्रद्धालुओं ने भोर से ही संगम के पवित्र जल में आस्था की डुबकी लगाई। माघ मेला में यह पर्व कल्पवासियों के लिए विशेष महत्व रखता है, जो एक महीने तक तपस्या और पूजा-अर्चना करते हैं। त्रिजटा स्नान माघी पूर्णिमा के बाद होता है और इसे कल्पवासियों का अंतिम स्नान पर्व माना जाता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, त्रिजटा संगम स्नान का अत्यधिक महत्व है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, रामायण काल में त्रिजटा नामक राक्षसी ने सीता माता की रक्षा की थी। यह स्नान पर्व त्रिजटा की तपस्या और उनके परोपकारी कार्यों का प्रतीक माना जाता है।

इस स्नान का संबंध गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती नदियों के संगम से भी है। श्रद्धालु इस दिन संगम में तीन डुबकी लगाकर मां गंगा और मां यमुना से अनजाने में हुए अपराधों के लिए क्षमा याचना करते हैं। ऐसा माना जाता है कि इससे आत्मशुद्धि होती है और पापों से मुक्ति मिलती है। 

त्रिजटा स्नान के अवसर पर संगम की रेती पर श्रद्धालुओं का भारी जमावड़ा देखा गया। माघी पूर्णिमा के बाद बचे हुए कल्पवासियों के लिए एक महीने की तपस्या के उपरांत यह दिन विशेष महत्व रखता है। स्नान के पश्चात श्रद्धालु गंगाजल और संगम की रेत लेकर अपने घरों को लौटते हैं।

त्रिजटा स्नान पर्व पर श्रद्धालु और कल्पवासी संगम त्रिवेणी में स्नान के बाद दान-पुण्य करते हैं। वे गंगा मैया से सुख-समृद्धि की कामना करते हुए बड़े हनुमान जी के दर्शन कर प्रार्थना करते हैं कि उन्हें अगले वर्ष भी संगम की रेती पर कल्पवास करने का अवसर मिले।

इस पर्व के संपन्न होने के बाद माघ मेला क्षेत्र धीरे-धीरे खाली होने लगता है। हालांकि, माघ मेले का औपचारिक समापन 15 फरवरी को महाशिवरात्रि के स्नान पर्व पर होगा। उस दिन एक बार फिर लाखों श्रद्धालुओं के संगम तट पर पहुंचने की उम्मीद है।

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