Taliban की ताकत देख Asim Munir ने की शांति की अपील, पाक-अफगान वार्ता का दूसरा दौर 6 नवंबर को

पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच शांति वार्ता के दूसरे दौर का आयोजन नवंबर के पहले सप्ताह में किया जायेगा लेकिन उससे पहले दोनों ओर से भड़काऊ बयानबाजी का दौर जारी है। लेकिन इस सबके बीच एक जोरदार परिदृश्य यह उभर कर आया है कि तालिबान की शक्ति को देखकर पाकिस्तानी सेना का हौसला पस्त पड़ गया है और इसीलिये पाकिस्तानी सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर हाथ जोड़ कर शांति की अपील कर रहे हैं। मुनीर ने कहा है कि पाकिस्तान अपने सभी पड़ोसी देशों के साथ शांति चाहता है, लेकिन सीमा पार आतंकवाद की अनुमति नहीं देगा। मुनीर ने यह टिप्पणी पेशावर में कबायली वरिष्ठ नागरिकों की ‘जिरगा’ (परिषद) से संवाद के दौरान की। सेना मुख्यालय के अनुसार, उन्हें पाकिस्तान-अफगान सीमा की सुरक्षा स्थिति, आतंकवाद-रोधी अभियानों और खैबर पख्तूनख्वा में जारी संघर्ष की जानकारी दी गई। मुनीर ने अफगान तालिबान के साथ हालिया तनाव के दौरान सुरक्षा बलों को मिले स्थानीय समर्थन की सराहना की और कहा कि पाकिस्तान आतंकवादियों और उनके समर्थकों से देश को मुक्त कराने के लिए प्रतिबद्ध है।उन्होंने कहा, “हम अफगानिस्तान समेत सभी पड़ोसियों से शांति चाहते हैं, लेकिन किसी भी पड़ोसी देश की जमीन से पाकिस्तान में आतंकवाद को बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए।” मुनीर ने यह भी बताया कि अफगानिस्तान से सीमा पार हमले जारी रहने के बावजूद पाकिस्तान ने धैर्य रखा है और काबुल को कई कूटनीतिक तथा आर्थिक प्रस्ताव दिए हैं।

इस बीच, तुर्की के विदेश मंत्रालय ने पुष्टि की है कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच 6 नवम्बर को इस्तांबुल में शांति वार्ता का नया दौर आयोजित होगा। उधर, दोनों देशों ने तब तक के लिए संघर्षविराम बनाए रखने पर सहमति जताई है। दूसरी ओर, तालिबान के गृह मंत्री सिराजुद्दीन हक्कानी ने पाकिस्तान पर “युद्ध से खेलने” का आरोप लगाते हुए कहा कि “अफगान लोग युद्ध नहीं चाहते, लेकिन अपनी धरती की रक्षा करना उनकी प्राथमिकता है।” वहीं पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने चेतावनी दी कि “अगर पाकिस्तान में कोई आतंकी हमला हुआ तो परिणाम बहुत कड़वे होंगे।”

इन सब बयानों पर गौर करें और खासकर पेशावर की जिरगा में फील्ड मार्शल आसिम मुनीर का “शांति संदेश” सुनें तो इसमें पाकिस्तान की वह पुरानी दोहरी नीति साफ दिखाई देगी, जहाँ जुबान पर अमन और हाथ में बारूद होता है। जब मुनीर कहते हैं कि “हम सीमा पार आतंकवाद नहीं सहेंगे”, तो यह सवाल उठता है कि क्या अब पाकिस्तान को अपने ही बनाए आतंक के दलदल में डूबने का एहसास हो गया है? दशकों तक आतंकवाद को “रणनीतिक संपत्ति” बताने वाला देश अब उसी जहर से ग्रस्त हो चुका है। खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में रोज़ाना होने वाले हमले, तालिबान के साथ सीमा संघर्ष और देश के भीतर अराजकता, यह सब पाकिस्तान की अपनी नीतियों का परिणाम है।

मुनीर की यह मजबूरी इसलिए भी स्पष्ट है क्योंकि अफगानिस्तान में तालिबान सरकार अब पाकिस्तान की कठपुतली नहीं रही। टीटीपी को शरण और समर्थन देकर काबुल ने साफ कर दिया है कि वह इस्लामी “भाईचारे” की आड़ में अब इस्लामाबाद की चालें नहीं मानेगा। सब जानते हैं कि पाकिस्तान की सेना और आईएसआई ने दशकों तक आतंकवाद को एक “सामरिक संपत्ति” (Strategic Asset) की तरह इस्तेमाल किया। भारत, अफगानिस्तान और ईरान तक को अस्थिर करने के लिए चरमपंथी गुटों को प्रशिक्षित किया गया। आज वही जहर पाकिस्तान की नसों में फैल चुका है। तालिबान से झड़पें, 70 से अधिक मौतें, और सीमावर्ती व्यापार का ठप होना, ये सब उसी नीतिगत पाखंड का नतीजा हैं।

दूसरी ओर, इस्तांबुल में 6 नवम्बर को पाकिस्तान-अफगान शांति वार्ता के आयोजन का ऐलान हो गया है, जिसकी मध्यस्थता तुर्की और क़तर कर रहे हैं। लेकिन इतिहास गवाह है कि जब भी पाकिस्तान “शांति वार्ता” की बात करता है, उसके पीछे या तो सामरिक दबाव होता है या आर्थिक दिवालियापन। इस बार दोनों हैं। इस्तांबुल में प्रस्तावित पाकिस्तान-अफगान वार्ता कूटनीतिक संकट को अस्थायी रूप से टाल सकती है, लेकिन उसका समाधान नहीं निकाल सकती। देखा जाये तो पाकिस्तान की सेना के सामने अब दो मोर्चे हैं— एक, पश्चिम से आती गोलियां; दूसरा, भीतर से उठता भूख, बेरोज़गारी और असंतोष।

भारत को इस पूरे घटनाक्रम को केवल ‘पाक-अफगान विवाद’ के रूप में नहीं, बल्कि पाकिस्तान की रणनीतिक विफलता के रूप में देखना चाहिए। एक ओर पाकिस्तान अपनी सीमाओं को नियंत्रित नहीं कर पा रहा, दूसरी ओर वह दुनिया को दिखाना चाहता है कि “हम आतंकवाद के खिलाफ हैं।” यह वही ढोंग है जो उसने दशकों से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर किया है। लेकिन अब परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं और दुनिया जानती है कि पाकिस्तान “आतंक का उत्पादक” और “पीड़ित” दोनों बनना चाहता है।

भारत के लिए यह समय सतर्कता का है क्योंकि पाकिस्तान अब दो मोर्चों पर बंट चुका है। पहली है अंदरूनी अस्थिरता और दूसरी है पश्चिमी सीमा की अराजकता। इससे भारत के खिलाफ पाकिस्तान की पारंपरिक सामरिक आक्रामकता सीमित होगी। इसके अलावा, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच तनाव से मध्य एशिया में चीन की ‘बेल्ट एंड रोड’ (CPEC) परियोजना पर खतरा बढ़ेगा। साथ ही, भारतीय नीति-निर्माताओं को यह समझना चाहिए कि पाकिस्तान का “शांति संदेश” वास्तव में अंतरराष्ट्रीय दबाव कम करने की कोशिश है— विशेषकर तब जब IMF और FATF की निगाहें उस पर गड़ी हों।

सैन्य दृष्टि से देखा जाए तो पाकिस्तान की “आतंक-नियंत्रण नीति” अब पूर्ण विफल है। उसकी खुफिया एजेंसियां तालिबान-टीटीपी गठजोड़ की गतिविधियों पर नियंत्रण खो चुकी हैं। खैबर पख्तूनख्वा का बड़ा हिस्सा धीरे-धीरे पाकिस्तान की प्रशासनिक पकड़ से बाहर जा रहा है। ऐसे में पाकिस्तान की सेना के लिए “सीमा पार आतंकवाद नहीं होने देंगे” जैसा वाक्य एक आत्म-प्रवंचना से अधिक कुछ नहीं।

कुल मिलाकर देखें तो मुनीर का “शांति-भाषण” दरअसल पाकिस्तानी सेना की कमजोर होती पकड़ और फिसलती जमीन का बयान है। पाकिस्तान को अब यह समझ लेना चाहिए कि आतंकवाद किसी का मित्र नहीं होता वह अंततः उसी को भस्म करता है जिसने उसे जन्म दिया। मुनीर चाहे जितनी बार “शांति” की बात करें, सच्चाई यह है कि पाकिस्तान के शब्दों में नहीं, उसके कृत्यों में झूठ की बारूद भरी है।

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